Thursday, 23 May 2013

बेटी के सम्मान मे दोहे

दोहे
बेटी के हाथो सभी...
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घर आँगन की लाडली,खुशियाँ दे भरपूर।
बेटी के हाथों सभी, हो मंगल दस्तूर ।

बेटी ही बनती सदा,नव जीवन आधार ।
दो-दो घर के सपन को,करती है साकार।

आँगन की किलकारियॉ, पायल की झंकार ।
भूल सके ना हम कभी, बेटी का उपकार।

बेटी मे संवेदना, और बसा है भाव।
आँगन की तुलसी जिसे,पूजे सारा गाँव ।

बेटा है घर का शिखर,बेटी है बुनियाद ।
जीवन भर करती रहे,नैन मूंद संवाद ।

भाग्यहीन समझो उसे,या कमजोर नसीब।
आँगन मे बेटी नही,वो घर बडा गरीब।

हाथ जोड़ कर मानती,जीवन भर उपकार ।
उस बेटी को किजिए,दिल से ज्यादा प्यार ।

खुशी - खुशी स्वीकार कर,दो- दो कुल की रात।
आँसु और मुस्कान को ,बेटी दे संगीत।

@संदीप सृजन
संपादक -शब्द प्रवाह
ए-99 वी.डी.मार्केट,
उज्जैन(म.प्र.)456006
मो.09926061800

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