Tuesday, 28 May 2013

पत्रकार की ग़ज़ल

एक पत्रकार की ग़ज़ल
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जिन्दगी के आस पास देखता हूँ ।
अपनी नजर से कुछ खास देखता हूँ ।

कलम स्याही मे डुबोने से पहले ।
खुद का आत्मविश्वास देखता हूँ ।

तमस से लड़ने की आदत क्या हुई।
हर वक्त भीतर  उजास देखता हूँ ।

सियासत से दोस्ती करने से पहले ।
अपने वतन का विकास देखता हूँ ।

खबरो का विस्तार अक्सर करता हूँ ।
पर पहले संधि व समास देखता हूँ ।

@संदीप सृजन
संपादक शब्द प्रवाह

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