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सात दशक की स्वतंत्रता और चंदु भैया की शोध डायरी (व्यंग्य)

हमारे चंदू भैया सामाजिक और साहित्यिक जीव है और उनका जन्म भी हमारी तरह स्वतंत्र भारत में हुआ इसलिए उनने भी बचपन में पुस्तकों में पढ़ा और अध्यापकों से सुन रखा था कि भारत स्वतंत्र है। तभी से उनको ये आभास होने लगा था कि भारत में रहकर वो जो मर्जी आए, कुछ भी कर सकते है। वे बचपन से ही स्वतंत्रता का उपयोग करते भी थे पर उनको कई बार लगता था कि भारत के लोग कुछ ज्यादा ही स्वतंत्र हो गये है। इस ज्यादा स्वतंत्रता के बारे में उन्होंने हिंदी का शब्द कोश तलाशा तो उनको शब्द मिला स्वच्छंदता। इसी तलाश के चलते यह स्वतंत्रता कब और कैसे स्वच्छंदता में परिवर्तित हो गयी ये न कभी उनने पढ़ा और न ही सुना पर महसूस कर रहे थे।

स्वतंत्रता का स्वच्छंदता में बदलना एक गहन शोध का विषय है। पर भारत में शोध बिना सरकारी सहायता के संभव नहीं है और कोई भी सरकार स्वतंत्रता के स्वच्छंदता में बदलने के कारण पर शोध करवाने में कोई रुचि नही रखती और ना कोई भविष्य में इस तरह की संभावनाएं दिखाई देती है। कारण कोई भी विश्वविद्यालय इस तरह के शोध के लिए अनुमति देने को तैयार नहीं है, और न ही कोई प्राध्यापक इस विषय पर मार्गदर्शक बनने को राजी है। क्योंकि इस विषय में जानते समझते सब लोग है। पर कोई भी व्यक्ति लिखित में इसको प्रुफ करने की जोखिम नहीं उठा सकता। जो जोखिम उठाएगा सबसे पहले उसी की कलाई खुलेगी ये भी तय है।

इसलिए भारत में स्वतंत्रता है या स्वच्छंदता यह समझने के लिए चंदू भैया ने एक दिन अपने विवेक का उपयोग करके अपने आसपास नजरें दौड़ाई और प्राइवेट तरीके से शोध करने का मन बनाया। जिसे चंदू भैया ने अपनी डायरी में नोट भी किया। आइए देखते है सात दशक की स्वतंत्रता को दौरान चंदू भैया की शोध डायरी के सात स्वतंत्र पृष्ठ जहॉ हम सब परतंत्र है।

 

पहला पेज- सुबह नज़रें अपने घर बाहर की सड़क पर गई जहॉ लोग आम दिनों की तरह ही आ-जा रहे थे कि अचानक स्वतंत्र भारत में जन्में कुछ स्वतंत्र युवा मोटर सायकिलों पर लदे एक बाद एक दनादन नारेबाजी करते हुए गुजरे और मोटर सायकिलों के बिना बंसी के सायलेंसरों की गर्जना से सारा मोहल्ला उन युवाओं को देखने के लिए घर के खिड़की दरवाजों पर खड़ा हो गया। कोई बात मुझे समझ आती इससे पहले ही एक पुतले को चौराहे पर खड़ा कर उन युवाओ ने मुर्दाबाद के नारों के बीच आग लगा दी। वे युवा स्वतंत्र थे और स्वछंद आचरण कर प्रसन्न थे। पास खड़े पुलिस के जवान स्वतंत्र आचरण को स्वच्छंद आचरण में परिवर्तित होता देख कर भी मूक बने रहे। यदि वे स्वतंत्रता और स्वच्छंदता का फर्क उन युवाओं को समझाते तो हो सकता था कि उनकी स्वतंत्रता बाधित हो जाती।

 

दुसरा पेज- आज जिला अधिकारी के आफिस में जाना हुआ। आफिस खुलने का समय बाहर दीवार पर लिखा था प्रातः 10:30 बजे । मै बारह बजे गया फिर भी न साहब थे और न ही उनके बाबु । चपरासी ने बताया साहब तो शाम को चार बजे तक आते है और साड़े चार बजे चले जाते है। हॉ बाबु लंच के बाद तीन बजे आएंगे और पांच बजे तक रुकेंगे। तब तक आपको रुकना होगा। अब मैं बाहर अर्दली में बैठा सोच रहा था कि ये स्वतंत्र भारत के कर्मचारी है या स्वच्छंद भारत के। असली स्वतंत्र तो ये लोग है जो अपनी मर्जी से आफिस आते है और अपनी मर्जी से जाते है। जनता तो इनके एक दस्तखत के लिए सारा दिन अपनी स्वतंत्रता का त्याग कर देती है।

 

तीसरा पेज- आज कुछ रुपयों की जरुरत पड़ी तो बैंक जाना हुआ। सरकारी अफसरों की स्वतंत्रता के बाद बैंक की स्वतंत्रता का आलम बड़ा निराला है। बैंक में कैश काउंटर की अधिपति याने कैशियर देवी की दादागिरी देख कर तो लगा कि इसे कहते है। स्वतंत्रता और कुर्सी का नशा। हैड कैशियर और बैंक के शीर्ष अधिकारी उस देवी के स्वच्छंद आचरण के आगे नत मस्तक और पर परतंत्र दिखे। प्रबंधक के चार मौखिक और एक बार लिखित आदेश को भी वो कचरापेटी के हवाले करने का साहस रखती है। जिसे देख कर लगा की स्वतंत्र भारत में इन कम नम्बरों से पास बैसाखी के सहारे कुर्सी पर बैठे कर्मचारियों के सामने योग्यता घुटने टेकती है।

 

चौथा पेज- स्वतंत्र भारत जनता अपनी सरकार खुद चुन सकती है। मैने भी युवा होते ही सरकार चुनना शुरू कर दिया था अट्ठारह पुरे होते ही पहली बार मतदान किया और अपनी सरकार भी चुनी मैने जिसको चुना वह मंत्री बन गया। जब तक वो चुनाव में उम्मीदवार था। वो और मै दोनों स्वतंत्र थे पर जैसे ही वो चुनाव जीता और मंत्री बना स्वच्छंद हो कर विधान परिषद में उड़ान भर रहा है। और मै अपने मोहल्ले में खुदी हुई सड़को पर चलते हुए खुद को डरा हुआ और परतंत्र महसूस कर रहा हूँ। मै जानता हूँ कि स्वतंत्रता के अधिकार के तहत चुने गए मंत्री जी ने अपनी पूरी स्वतंत्रता का उपयोग किया और अपने समर्थकों या मित्र मंडली वालों के लिए स्वतंत्रता के द्वार खोल दिए तो मेरी हालत भी मोहल्ले की सड़क की तरह हो सकती है। मै अगले चुनाव की प्रतिक्षा कर रहा हूं ताकि फिर से एक बार स्वतंत्र होने का अवसर मुझे मिले।

 

पांचवा पेज- टीचर से लेकर स्टूडेंट और पब्लिक स्कूल से लेकर कोचिंग इंस्टिट्यूट तक स्वतंत्रता का गजब का खेल है। टीचर क्लॉस में न हो तो बच्चे स्वतंत्रता ही नही स्वच्छंदता का आनंद लेते है। प्रिंसीपल न हो तो टीचर स्वच्छंद होते है। पब्लिक स्कूल तो वैसे भी स्वच्छंदता के अखाड़े से कम नहीं है। जहॉ सरकार के लाखों खर्च होते है और टॉप करते है इंग्लिश मिडियम के कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ने वाले बच्चें।सरकार का पैसा केवल गणना के लिए मास्टरों को दिया जाता है। स्कूल में रहो तो बच्चो को गिन लो नहीं तो जनगणना, पशुगणना, बीमारगणना, वोटरलिस्ट बनाना आदि स्वतंत्र कार्य करो। जो कि वे स्वच्छंद होकर करते है। और पढ़ाई में सफलता का झंडा कोचिंग इंस्टिट्यूट वाले बड़े-बड़े विज्ञापन देकर लहराते है। यही स्वतंत्रता है वे घोषित करते है हम स्वच्छंद है।

 

छठा पेज- अस्पतालों के मामले में सरकारी हो या प्राईवेट दोनों की स्वतंत्रता से जन जन का पाला पड़ा होता है। सरकारी अस्पताल में तो वार्डबॉय से लेकर सर्जन तक सब स्वतंत्र होते है। और वहॉ आए मरीज की आत्मा को शरीर की कैद से मुक्त करवाने के लिए अपना असहयोग देकर पुरा प्रयास करते है। प्राईवेट अस्पतालों में स्वतंत्रता का आलम गज़ब का होता है। यहॉ के डाक्टर मरीज की आत्मा को मरने के बाद भी शरीर से स्वतंत्र नहीं होने देते। बल्कि मरीज के परिजनों को आर्थिक रुप से स्वतंत्र करने का प्रयास जरुर करते है। दोनो जगह डॉक्टर स्वतंत्र होते है। और स्वच्छंदता से अपना कर्म करते है।

 

सातवां पेज- बोलने की स्वतंत्रता सबको मिली है। जिसे जो समझ पड़े वो सार्वजनिक रुप से बोलने के लिए स्वतंत्र याने स्वच्छंद है। कोई भी खुल कर किसी को पप्पु कह सकता है। फेंकु कह सकता है। सामने न कह सकने वाली बात इशारों की भाषा में कह सकते है। पर अपनी पत्नी के सामने न मैं बोल पाता हूं और इशारों की भाषा में बच्चों को संबोधित करते हुए कुछ कह पाता हूँ। स्वच्छंदता तो दूर सही से स्वतंत्रता का भी उपयोग नहीं कर पाता हूँ। कईं बार लगता है चाहे भारत स्वतंत्र है पर पत्नी के आगे संतरी से लेकर मंत्री । चपरासी से लेकर अधिकारी तक सब परतंत्र है। और पत्नी स्वच्छंद है।

 

नेता से लेकर अभिनेता तक और शिखर से लेकर तलहटी तक जहां भी नजर दौड़ आएंगे आप हर किसी को स्वच्छंद पाएंगे यह तो बानगी है पर स्वच्छंदता अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग तरीके से दिखाई देगी स्वतंत्रता के नाम यहां हर कोई स्वच्छंद है।

-संदीप सृजन

संपादक-शाश्वत सृजन

ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन (म.प्र.)

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मेल- sandipsrijan.ujjain@gmail.com

अख़बार रद्दी कर गया विकास (व्यंग्य)


सुबह का अखबार शाम को रद्दी हो जाता है यह तय है पर इस बार अखबार सुबह-सुबह ही रद्दी हो गया। ये चंदू भैया के जीवन में किसी हादसे से कम नहीं है। पूरे चार रुपये का अखबार चंदू भैया को लेना पड़ रहा है। वो भी मजबूरी में। क्योंकि बचपन से ही चंदु भैया को तंबाखू और बीड़ी मांगने की आदत रही। उनने सदा से ही मांग कर ही अखबार पढ़ा है। पर कोरोना के कारण लोग कोई भी मांगी हुई चीज दे नहीं रहे है। मांगने जाए तो भी पड़ोसी मुंह खोलकर इंकार कर देते है और कहते है कि कोरोना के कारण वे नहीं दे पाएंगे। माफ करे।

पहले तो पड़ोसियों का यह व्यवहार चंदू भैया को थोड़ा अटपटा लगा पर आखिर में मन मारकर उन्होंने एक अखबार की बंदी लगवा ही ली। पर अखबार वो मंगवाते जिसमें पेज ज्यादा हो और दाम कम हो। पर मुए लॉकडाउन के कारण सारे अखबारों ने दाम तो वही रखे पर पेज कम दिए। जिसके कारण रद्दी कम बैठ रही है और चंदू भैया अखबार से होने वाली आवक जावक का हिसाब लगाते हुए वैसे ही तनाव में रहते है। उन्हें पता है कि जितने रुपये वे हॉकर को देंगे उसका पच्चीस प्रतिशत ही कबाड़ी उनको देगा। याने पचहत्तर प्रतिशत नुकसान तय है। पर करे क्या आदत जो पड़ गई है।

आज तो चंदु भैया का तनाव और ज्यादा बढ़ गया। सवेरे-सवेरे अखबार में “विकास” कथा पढ़ रहे थे कि इतने में टीवी पर समाचार आ गया कि विकास की कथा में एक और नया पृष्ठ जुड़ गया है। विकास हमेशा आगे की ओर दौड़ता था। और रोज नया इतिहास लिखता था। कहते है जो दौड़ता है उसके पीछे भी कुछ लोग दौड़ते है, टांग खीचने के लिए। पर इस पृष्ठ में दौड़ने वाले विकास की कहानी में दौड़ के साथ ठहराव वाला भाग बड़ा रोचक और रोमांचक था। टांग खींचने वाली बात तो कहीं थी ही नहीं, बल्कि विकास खुद अपनी टांग लम्बी किए खड़ा हो गया। यही बात उसकी स्टोरी में और सस्पेंस ला रही थी। और चंदू भैया का रोमांच बढ़ता जा रहा था। विकास गया तो गया अखबार पढ़ने का सब मजा किरकिरा कर गया।

महाकाल शरण में आया था विकास पर लगता है महाकाल पर भरोसा नहीं था वरना वो दौड़ता नहीं तो जीवन छोड़ता नहीं और अपनी कहानी में अंतिम पृष्ठ जोड़ता नहीं। पर विकास न गिरता तो कईं और नीचे गिर जाते। विकास जिस रफ्तार से आगे बढ़ा था वो किस्सा किसी हिट फिल्म से कम नहीं था। बहुत ही रस आ रहा था विकास की गाथा को पढ़ने में, विकास की गाथा में विनाश ही विनाश का विकास था। सफेद, लाल, भगवा, खाकी सारे रंग विकास के रंग में रंगे थे। विकास का होना इन सब रंगों को बदरंग कर सकता था। बस यहीं एक भय विकास के विनाश का कारण बन गया। विकास गया तो गया पर चंदू भैया का शुक्रवार का अखबार रद्दी कर गया। और शनिवार को ताजा समाचार की जगह सत्यकथा पढ़ने को मजबूर कर गया।

-संदीप सृजन

संपादक-शाश्वत सृजन

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चंदू भैया का फेसबुकिया वैराग्य (व्यंग्य)


लॉकडाउन में फेसबुक लाइव का दौर जमकर चला। हमारे चन्द्रप्रकाश चंचल उर्फ चंदू भैया ने भी दिन के पन्द्रह घंटे किसी न किसी कवि या कवयित्री का लाइव देखा और प्रति मिनट किसी न किसी लाइन को कोड करके वाह और लाजवाब लिखा तो, कभी तालियों वाली इमोजी लगा कर अपने भी ऑनलाइन होने का एहसास करवाया। इसी दौरान एक दिन चंदू भैया ने भी खुद को लाइव प्रकट करने का मन बनाया चार दिन पहले पोते से एक बढ़िया सा पोस्टर बनवाया और फेसबुक पर अपनी वाल पर तो चेपा ही चेपा और कवियों -कवयित्रियों को पर्सनल मैसेंजर में भी भेजा, ताकि वे भी उनको सुने।

तय समय से 10 मिनट पहले ही पोते की मदद से चंदू भैया सिल्क के कुरते और जॉकेट में फेसबुक पर प्रकट हुए और कहने लगे- ‘मित्रों ! आप मुझे देख और सुन पा रहे हो तो कुछ लिखकर बताए, ताकि मुझे आपकी उपस्थिती का एहसास हो।‘ पर दिए गये समय के 15 मिनट बाद तक भी केवल 4-5 लोगों ने देखा वो भी 4-5 सेंकड के लिए और वे भी आगे बढ़ गये। एक घंटे तक गला फाड़ कर 6 गीत और 20 मुक्तक चंदू भैया ने पढ़े । पर सुनने वाले सब नदारत थे। जिनने लाइव पर सरसरी नज़र डाली उनमें वो कोई नहीं था, जिनके लाइव आने पर चंदू भैया ने कमेंट बाक्स में वाह-वाह लिखा था। एक घंटे के लाइव को अंत तक मुश्किल से 10 लोगों ने देखा वो भी अंजाने में। फिर भी चंदू भैया ने अपनी सोच को सकारात्मक रखा और सोचा घर के काम काज सभी को होते है। लगता है मैने समय गलत चुना और अपने मन को दिलासा दिया।

कुछ दिनों बाद अनलॉक के पहले सप्ताह में एक बार फिर लाइव होने का मन चंदू भैया ने बनाया और पहले से ज्यादा फेसबुक मित्रों और मित्राणियों को मैंसेंजर में संदेश भेजे। कुछेक नये छोरों ने जरुर शुभकामना दे दी। लेकिन जिनके लिए वे लाइव आ रहे थे वे सब मौन थे। पर मन को हतोत्साही नहीं होने दिया। हेयर डाई करके नये कुर्ता पहन कर मोबाइल कैमरे में फिर से पोते के सहयोग से इस बार शाम को 4 बजे लाइव हुए । ताकि हर कोई फ्री रहे और उनको देखने आ सके। मगर इस बार तो और भी ज्यादा बुरी गत हो गई। कोई चिडिया तो क्या कोई उल्लू भी नहीं आया। एक घंटा मन मार कर कैसे ग़ज़लें पढ़ी, ये तो चंदू भैया का दिल ही जानता है। लाइव के बाद उनके दिलों दिमाग में बस यही लाइने गूंज रही थी। उनकी गली से जब मेरा जनाजा निकला। वो नहीं निकले जिनके लिए मेरा जनाजा निकला।

दो दिन तक चंदू भैया ऐसे गुमसुम रहे जैसे उन का कोई भारी नुकसान गया हो। पड़ोस वाली भाभी ने आकर हाल-चाल पुछे तब कुछ ठीक हुए । पर ये महसूस होने लगा कि फेसबुक की दुनिया केवल आभासी है और दिखावटी है । सही दुनिया तो अपने पड़ोसी है, और पड़ोसी की धर्मपत्नि है जो रोज कुशलक्षेम तो पुछती है। अब उन्होनें मन बना लिया की वे फेसबुक से विदाई ले लेंगे । और उन्होने एक संदेश तैयार कर अपनी फेसबुक वॉल पर चेप दिया।

विशुद्ध साहित्यिक भाषा और क्लिष्ठ शब्दों में चंदू भैया ने जो लिखा उसे बहुत कम मित्र-मित्राणिया समझ पाए, पर इतना समझ गये कि चंचल जी फेसबुक से रिज़ाइन कर रहे है । कुछ मनचले युवा मित्र ने संदेश डालने के पहले ही मिनट के तीसवे सेंकड़ में बधाई और शुभकामना दे डाली। कुछ ने बड़े लटके मुंह वाली इमोजी चेप दी,तो 20-25 मैसेज के बाद एक सज्जन में लिखा क्यों-क्या हो गया, क्या किसी से विवाद हो गया, ये लिख कर बड़ा सा प्रश्नवाचक लगा दिया। 8 घंटे बाद एक कवयित्रि ने वही प्रश्न दोहराया तो चंदू भैया की वैराग्य तंद्रा टूटी और जवाब लिखा ऐसे ही मन भर गया। और वे उस कवयित्री के पुनर्प्रश्न के इंतजार में बार-बार फेसबुक टटोलने लगे। पर कोई प्रश्न नहीं आया। किसी और ने भी प्रश्न किया हो इस इंतजार में रात में जब भी नींद खुली फेसबुक नोटिफिकेशन देखते रहे।

अल सुबह एक भुक्तभोगी कवि ने ईमानदारी से कमेंट किया- ‘चंचल जी ये आभासी दुनिया है। किसी बात के लिए बुरा मान कर प्रस्थान भी कर गये तो आपको फूफाजी की तरह मनाने कोई नहीं आने वाला। आपके होने न होने से फेसबुक को और आपके मित्रों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फर्क आपको जरुर पड़ेगा। आपकी सेहत पर इसका असर दिखाई देगा। जो तुकबंदिया आप अपनी वाल पर चेपते और कविता बताकर अपनी भड़ास निकाल लेते थे। वे तुकबंदिया आपके मन को बेचैन करेंगी। आपके डुअल कैमरे वाला मोबाइल व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि उससे ली गई सेल्फियां प्रदर्शित होने से तरस जाएंगी। और जिन चेहरे अपलक निहार कर आप कविता रचते थे वे दिखना बंद हो जाएंगे। विदा होने से पहले कृपया एक बार और सोच ले। मैं इस अनुभव से गुजर चुका हूँ। इस कमेंट को पढ़ कर चंदू भैया की फेसबुक मुर्छा अचानक गायब हो गई। फेसबुक से जुड़ी वे सारी बातें याद आने लगी जिनकी वजह उनके जीवन में बहार आई और उनका जीवन गुलजार था। बगैर देर किए उन्होनें कमेंट करने वाले कवि को धन्यवाद दिया और तुरंत फेसबुक पर नीरज जी की कविता कुछ सपनों के मर जाने से जीवन मरा नहीं करता चेप कर अपने फेसबुकिया वैराग्य को भूला दिया।

-संदीप सृजन

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चलो, फुर्सत हो गई अब मर जाओ (व्यंग्य)


एक समय था, जब आदमी कहता था कि मरने की फुर्सत नहीं है, आदमी का ये जुमला सुन कर ही लगाता है कि कोरोना आदमी के फुर्सत से मरने की व्यवस्था करने आया है। लॉकडाउन लगवा कर सबको फुर्सत करवा दी और कह रहा है- लो मरो, अब फुर्सत है। पर मारना कोई नहीं चाहता हर आदमी जिंदा रहने के लिए जुगाड़ लगा रहा है। जुगाड़ इसलिए कि मास्क, सेनेटाईजर दोनों हमारे देश में जुगाड़ के चल रहे है। एन-91 का काम हमारे यहॉ घर पर बनी मुंह पट्टी और गमछा कर रहा है। सेनेटाईजर का काम शहरों में सर्फ का पानी और गॉवों में राख कर रही है।

जो दादी रोज ओटले पर बैठ कर मोहल्लें के लोगों को सुनाते हुए कहती थी कि ‘भगवान मुझे उठा ले- भगवान मुझे उठा ले’ वो भी कोरोना के आते ही घर के अंदर घुस गई है। चौवीस घंटे मास्क लगा कर रख रही है। और दिन रात घर के दरवाजे की तरफ देखती रहती है, कोई अपरिचित घर में आए तो देहरी के भीतर नहीं आने देती। हर अंजान उसे मौत का दूत लगता है। किसी को अपनी खटीया के करीब भी नहीं आने देती। सेनेटाइजर की बोतल सिरहाने ही रखती है और दिन में चालीस बार अपने हाथों पर लगाती है। और अब तो ये कहना भी छोड़ चुकी है कि भगवान मुझे उठा ले।

दिन रात काम और पैसे के चक्कर में जो कहते थे कि मारने की फुर्सत नहीं उनसे कहा जाए चलो फुर्सत हो गई अब मर जाओ। तो हो सकता है कि वे आपके पीछे हंटर लेकर दौड़ पड़े। क्योंकि काम सब बंद हो गये और पैसा आना भी बंद है। ऐसे लोग कसम खा लेंगे कि भूल से भी ये नहीं कहेंगे कि मरने की फुर्सत नहीं। फुर्सत नहीं थी तब कोई जहर खाकर मरने की तैयारी करता, कोई फांसी लगाकर लटकने की सोचता, कोई रेल पटरी पर सोने का मन बनाता। लेकिन कोरोना ने आकर जबसे चपेट में लेना शुरु किया है हर कोई मरने के नाम से ही डरने लगा है।

पहले कोई हार्टअटेक से मरता, कोई सांस रुकने से मरता, कोई छाती में गैस चढ़ने से मरता, कोई गंभीर बिमारी से मरता पर अब तो हर मरने वाला अपनी मौत का इल्जाम इस कोरोना पर ही लगा कर जा रहा हैं। एक कोरोना ने सारे कारण खत्म कर दिए। सोचिए व्यस्त और त्रस्त जिंदगी के बीच एक स्वस्थ जिंदगी जीने का तरीका सीखा दिया। 

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको घर के लोग जिनको कहते थे ‘काम का न काज का दुश्मन अनाज का’ याने असल जिंदगी में इनके पास कोई काम नहीं होता है दिन रात केवल आभासी काम याने टिकटॉक, फेसबुक, और व्हाटसएप के अलावा उनको कुछ सुझता ही नहीं हैं और सोफे और पलंग पर गड्डे जिनकी वजह से पड़ जाते है, जिनको सुबह उठते ही ताने सुनने पड़ते है। और कोई काम घर से बाहर का बताओ तो पड़ोसी के ओटले पर जा कर आधा घंटा विडियो देखने के बाद काम करके घर आते है। वे अब कोरोना के आने के बाद से अपना जीवन अब बहुत शांति से गुजार रहे है।

उनको अब न ताने सुनने पड़ रहे है और न ही कोई घर से बाहर जाने को बोलता है। घर के लोग भी सोचते है पड़ा रहने दो, घर से बाहर गया तो न जाने कहॉ से सामान के साथ कोरोना ले आया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। ये बाहर जाकर वैसे भी कोई बड़ा काम नहीं कर सकता है, कम से कम घर में रहकर आठ-दस व्हटसएप ग्रुप तो चला रहा है। इसके अंडर में दो –ढाई हजार लोग तो है जो बिना पगार के लोगों को सुचनाएँ भेजते है, और कोरोना के विकट दौर में लोगों का मनोरंजन करते है। ये स्मार्टफोन में घुसकर ही स्मार्ट बन गया तो ही अपने भाग्य संवर जाएंगे। वैसे भी सरकार ‘वर्क फ्रॉम होम’ पर ही तो जोर दे रही है। बाहर जा कर मौत ले आए उससे तो अच्छा ही है कि घर में रहे और काम करे तो साल भर में इसकी लुगाई ला देंगे। बस ये फुर्सत में न रहे। इसे मरने की फुर्सत भी न मिले यही सबकी कामना है।

-संदीप सृजन

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हिंदी साहित्य के इतिहास में तालाबंदी काल (व्यंग्य)



हिंदी साहित्य के इतिहास पुनर्लेखन का समय फिर से एक बार निकट आता दिखाई दे रहा है। वीरगाथा काल से शुरु हो कर भक्ति काल, रीति काल और आधुनिक काल तक लिखे गये इतिहास में अब तालाबंदी (लॉकडाउन) काल को जोड़ना पड़ेगा। लॉकडाउन का सही उपयोग किसी ने किया तो वह हिंदी के रचनाकारों ने किया। कोरोना को देश भगाने के जितने प्रयास किए गये उनमे हिंदी के रचनाकारों ने भी अपने मोबाइल के माध्यम से सोशल मिडिया पर जमकर योगदान दिया। यहॉ तक की इस काल में कई नये रचनाकार भी पैदा हुए। जिनको जीवन पर्यन्त साहित्य का ‘स’ और कविता का ‘क’ छू भी नहीं पाया था वो भी कोरोना की कृपा से कवि हो गये। और अपनी छुपी हुई प्रतिभा से साहित्य समाज को संक्रमित करने लगे।

जो अकवि घर में बैठे-बैठे अभी तक केवल अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में सर खपाया करते थे उनको लॉकडाउन में प्रसारित महाभारत बड़ी शिक्षा दे गई। लॉकडाउन उनके लिए कवि-शायर बनने का सुनहरा अवसर लेकर आया। हस्तिनापुर नरेशों की तरह कई कवि और लेखक इस दौरान ऐसे पैदा हुए जिन्होंने किसी शायर की ग़ज़ल के दो शेर लिए और किसी कवि की कविता की चार पंक्तियां ली और जोड़-तोड़ कर एक नई कविता को जन्म दिया और अपनी संतान घोषित कर दिया।
लॉकडाउन काल से पहले तक जो लोग बैंक और बीमा कम्पनी से मुफ्त मिली डायरियों में लिख कर जिंदगी को गुलज़ार रखने का प्रयास करते थे, इस काल में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हॉटसएप के माध्यम से अपनी तुरन्त जन्मी कविता का ‘जातकर्म’ संस्कार सम्पन्न करवाते नज़र आए। कुछ ऐसे लोग जिनको घरेलु और  ‘बाथरुम सिंगर’ का खिताब प्राप्त था, वे लोगों बच्चों के हाथ में मोबाइल पकड़ा कर अपनी प्रतिभा का सार्वजनिक प्रदर्शन करने लगे।

लॉकडाउन काल में वाचिक परम्परा के कवियों के हाथ से माया और राम दोनों निकल गये। रोज कवि सम्मेलन पढ़ने वाले कवियों को एक कवि सम्मेलन भी नसीब नहीं हुआ । और तो और अपनी पहचान व प्रतिभा को बचाने के लिए बिना पेमेंट लिए रोज नये कपड़े पहन कर फेसबुक/ इंस्टाग्राम पर आना पड़ रहा है। मंच पर चुटकुलों को कविता कहने वालो को ये डर सताने लगा है कि लोगों कहीं ये पता न चल जाए की कविता क्या होती है। अगर पता चल गया तो उनकी रोजी रोटी के लाले पड़ जाएंगे।
बगैर जाम के जूम के माध्यम से झूमती हुई ऑनलाइन काव्य गोष्ठियों ने तो वैश्विक रिकॉर्ड तोड़ दिए है। कुछ कवियों ने तो बकायदा रोज पॉच-छह गोष्ठियों में अपनी सक्रिय भागीदारी भी की और रोजाना बिस्किट की परमानेंट प्लेट सामने रखकर, घर की चाय पी कर, कभी अध्यक्ष तो, कभी अतिथी के रूप में अपनी प्यास बुझाई। आखिर पत्नी को कब तक नई रचना सुना-सुना कर पकाए। कुछ कवियों ने हड़बड़ाहट में इन कवि गोष्ठियों का रिकॉर्ड नहीं रखा, लेकिन जो कवि रिकार्ड रखने में होशियार है वे इतिहास लेखन से पहले गिनीज बुक और वर्ल्ड बुक वालों प्रमाण पत्र प्रदान करने के लिए बाध्य करने की तैयारी कर रहे है। जो कि गिनीज बुक और वर्ल्ड बुक को सम्मान सहित उन्हें प्रदान करना भी पड़ेगा।
फेसबुक के माध्यम से ऑनलाइन आने वालों ने भी लॉकडाउन काल में कुछ कम योगदान नहीं दिया है। रोज किसी ना किसी विषय को लेकर घंटों लंबी चर्चाएं करते है। जो चर्चाएं अभी तक बंद कमरे या किसी स्कुल के हाल में होती थी वह सार्वजनिक होने लगी है। जिनके भाग्य में मुश्किल से अतिथियों सहित पॉच श्रोता होते थे, उन्हें अब बीस-पच्चीस श्रोता मिलने लगे जो कि पूर्वकाल से 4 गुना 5 गुना थे। और वह भी लाइक और पारम्परिक कमेंटस् के साथ। ‘बहुत खूब’, ‘सुंदर रचना’, ‘बधाई सर’, ‘मजा आ गया आपको सुन कर’ ऐसे कमेंटस् लिख कर चर्चा में अपनी उपस्थिती दर्ज करवाने और चर्चा को सफल बनाने वालों का योगदान भी अभूतपूर्व है। क्योंकि उनको भी जीवन में वह सब सुनने को मिल गया जिसे सुनना उन्होने चाहा ही नहीं। हालांकि फेसबुक पर श्रोता कम दर्शक अधिक होते है। पर जब घर बैठे गंगा घर आए तो कौन हाथ नहीं धोए। सर का सम्मान भी हो गया और संबंधों में भी एक बार फिर मिठास घुल गई।

जो ‘कवि कम श्रोता’ थे उनके लिए लॉकडाउन काल स्वर्णिम काल रहा। वे कवि जिनके भीतर कवि सम्मेलन के मंचों पर चढ़ने का कीड़ा तो सालों से कुलबुला रहा था, लेकिन उन्होंने कोई बुला नहीं रहा था और ना कोई जुगाड़ लग पा रहा था ऐसे में यह अवसर उनके लिए तो परमात्मा के दिए किसी दिव्य वरदान से कम नहीं रह। अपना फेसबुक/ इंस्टाग्राम एकाउंट, अपना मोबाइल, अपने शब्द, अपनी मर्जी, सब कुछ अपना यहॉ तक की उन्हें झेलने वाले भी अपने, याने कि जो उनके फेसबुक/ इंस्टाग्राम मित्र हैं । यदि पहुंच थोड़ी लंबी हुई तो किसी समूह या किसी संस्था के बैनर तले बने फेसबुक/ इंस्टाग्राम पर काव्य पाठ कर अपनी भूख मिटा रहे है। कुछ ने तो लंबी कहानियाँ, व्यंग्य और उपन्यास के अंश तक ‘लाइव हावर’ में पढ़ डाले, चाहे उनके श्रोता दो या तीन रहे हो या अंत तक पहुंचते समय शुन्य हो गये हो। लेकिन वर्तमान लॉकडाउन काल में वे फेसबुक लाइव आने वालों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा गये। और लॉकडाउन के इतिहास लेखकों के लिए सिर दर्द बन गये।
-संदीप सृजन
संपादक-शाश्वत सृजन
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व्यंग्य- प्रेम दिवस पर प्रेमियों से आव्हान




मैं प्रेमी हूँ,इससे समाज वालों के पेट में दर्द क्यों होता है। दर्द होता है तो हो मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर प्रेम भी तो ईश्वर का दिया गया उपहार है । रामायण, महाभारत के काल से आज तक प्रेम भी मृत्यू की तरह शाश्वत है। पर ये कटू सत्य है की जमाने को किसी का प्यार करना सुहाता नहीं है।
प्रेम पर बड़े बड़े ग्रंथ लिखे गये, कितनी ही कविताएँ लिखी गई, लग भग सारी फिल्में प्रेम पर ही बनी। कई लोगों ने प्रेक्टिकल करके भी जीवनी लिखी। लेकिन समाज में आज भी प्रेम को जायज और नाजायज दो अलग -अलग दृष्टि से देखा जाता है।प्रेम जब एक शब्द है तो दृष्टि दो क्यों? डबल तो उनको दिखता है जिनकी दृष्टि में दोष होता है। महापुरुषों ने कहा है “दृष्टि बदलों सृष्टि बदल जाएगी।”
प्रेम हर कोई करता है पर पाता भी है ये कहना थोड़ा मुश्किल जरुर है पर असंभव नहीं । “सियासत और महोब्बत में सब जायज है” ये सूत्र जिसने रट्टा लगा के जेहन में उतार लिया उसके प्रेम में सफल होने की संभावना ज्यादा होती है। आज मै निःसंकोच प्रेमियों के हक में बात करुंगा। क्योंकि प्रेम का त्यौहार है और हर कोई प्रेमी है। कोई खुल्लम-खुल्ला तो कोई दबे छुपे। प्रेमियों को समाज ने सदैव हैय दृष्टि से देखा है। समाज तो ठीक सरकार ने भी इनके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया। कोई आयोग प्रेमियों के हित में नहीं बनाया ।
प्रेम एक तरफा हो तो यह बेदर्द समाज प्रेमी को अंधा तक कह देता है। लेकिन सरकार का कोई नीति नहीं की प्रेमी को अंधा कहने वाले को सजा दी जाए। देश का बहुत बड़ा वर्ग प्रेमी वर्ग है इसके बावजूद कोई दल प्रेमियों की परवाह नहीं करता है। हर जगह प्रेमी उपेक्षा के शिकार है। प्रेमी अपने प्रेम को पाने के लिए क्या क्या नहीं करता यहॉ तक की जान की बाजी भी लगाने को हरदम तैयार रहता है। भाग जाना और भगा ले जाने वाली परम्परा तो महाभारत काल में श्रीकृष्ण और रुकमणि के समय से आज तक जारी है लेकिन इसके लिए बाहुबल का सामर्थ चाहिए नहीं तो हाथ पैर बोनस मे तुड़वाने पड़ जाते है। 
अब प्रेमियों को भी अपना राजनैतिक वर्चस्व बनाना चाहिए। समाज और सियासत उसी की होती है जो एक जूट होते है। जो एक जूट नहीं है वे केवल जूते खाते है। देश का कोई श्रेत्र ऐसा नहीं हो जहॉ प्रेमियों का बोल बाला न हो। हर जगह प्रेमियो को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हर विभाग में प्रेमियों के लिए आरक्षण होना चाहिए। देश में जब सबके विकास की बात चल रही है तो प्रेमियों का भी विकास होना चाहिए।
प्रेमियों को मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल के गठन की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। जो एनजीओ पीछे के रास्तों से प्रेमियों की मदद करते आए है उनकों सामने के रास्ते से प्रेमियों को मिलवाने, घर वालों को मनाने और न माने तो प्रेमियों को भगवाने की व्यवस्था करना चाहिए। ताकि समाज में और देश में उन एनजीओ का नाम प्रेम के क्षेत्र में सम्मान से लिया जा सके और भविष्य में राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए उनकी अनुशंसा प्रेमियों द्वारा की जा सके।  
सभ्य समाज और प्रेमियों की स्थिती हमेशा से देव दानव की तरह रही है। दानवों को देवता फूटी आंख नहीं सुहाते है। आज भी वही स्थिती प्रेमियो और समाज की है। दोनों के बीच परम्परागत छत्तीस का आंकड़ा आज भी बना हुआ है। देवासुर संग्राम की तरह ही प्रेमियों को अपने अधिकार पाने के लिए इतिहास के उदाहरणों की पीठ पर,परम्पराओं की रस्सी से, विचारों का पर्वत रख कर समाज के साथ मथना होगा और प्रेमामृत का पान हर इंसान को करवाना होगा तभी प्रेमियों का साम्राज्य बना रह सकेगा। वरना अपनी पहचान भी खो बैठेंगे प्रेमी, प्रेमियों जागों अपनी शक्ति का प्रदर्शन करो।
आज प्रेम दिवस पर मैं सभी प्रेमियों से आव्हान करता हूँ समाज तुम्हारा बहिष्कार करे तुम उससे पहले समाज का बहिष्कार कर दो और अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ प्रेम समाज में शामिल हो जाओ। काम देव और रति को अपने आराध्य के रूप में प्रतिष्ठित करवाओ। और प्रेम नगर की स्थापना करो।
-संदीप सृजन
संपादक- शाश्वत सृजन
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राजनीति में बीज गणित का सवाल -महाराष्ट्र (व्यंग्य)




राजनीति करने वाली ताकतें सच में बेहद ताकतवर होती हैं । हम सोच भी नहीं सकते उससे भी ज्यादा ताकतवर होती हैं। सिर्फ ताकतवर ही नहीं होती है, देश को जोड़ने, तोड़ने के साथ सरकारों को बनाने, बिगाड़ने और दिग्भ्रमित करने का इनमें अप्रतिम कौशल होता है। सरकार बनाना कोई मजाक या बच्चों का खेल नहीं है। आपकी और हमारी सरकार तो घर भी ठीक से नहीं चला सकती है तो प्रदेश और देश की कल्पना करना दिन तारे ढूंढने जैसा है। अगर आपको खुदकुशी भी करनी है तो उसके लिए एक लंबी तैयारी करनी पड़ेगी। खुद को दिमागी तौर पर तैयार करने के बाद कुछ जरुरती सामान का जुगाड़ भी करना पड़ेगा। सोचिए जब खुद की जान लेना हो तो इतना सोचना पड़ता है तो रात भर में सरकार बनाना कितना मुश्किल होगा। बहुत ही जोखिम भरा काम है सरकार बनाना।
किसी के राय मशवरों पर एक रात में पानी फेर देना आपके और हमारे बस की बात नहीं है। आप और हम ठहरे सामान्य आदमी, पारिवारिक आदमी, कामकाजी आदमी और भारतीय नैतिक मूल्यों की दुहाई दे कर जीवन को गधे की तरह ढोने वाले आदमी, जो केवल मतदान कर अपने आप को इस लोकतंत्र का राजा मान लेते है। जबकि सच ये है कि सरकार का ढ़ाचा हम बना सकते है पर उपर का रंग रोगन और इंटीरियर डेकोरेशन हमारे हाथ में बिलकुल नहीं होता है क्योकि हममें राजनीति की समझ ही नहीं है।
आज देश में कहीं भी विधानसभा चुनाव हो निन्यानवें टका सरकारें मोठा भाई की बन रही है। एक टका कहीं दूसरे ने बना भी ली तो उनको रात को सपने में मोठा भाई मिटिंग करते दिखते है । और ये ही डर बना रहता है की सुबह सरकार न बदल जाए। महाराष्ट्र में सरकार बनाने की जिद पर अड़े लोग अड़े के अड़े ही रह गये और मोठा भाई ने पिछवाड़े से बिना बारात के सत्ता सुंदरी और फडणवीस का लग्न करवा दिया और तो और जिसने पीछे से निकलने में मदद करने वाले छोटे पंवार को भी छोटी बेन दिलवा दी। दरवाजे पर अड़े और बातचीत कर रणनीति बनाने वालों को कानों-कान खबर नहीं होने दी कि लग्न हो गये और बारात घर आ गई। मोड़ बांधने की जिद अड़े छोटे ठाकरे को कुंवारा ही रहना पड़ा। और बापदादा की इज्जत की धज्जियां उड़ी वो अलग। 
लोकसत्ता की तुलना नगरवधु से की जाती रही है। और नगरवधु के प्रेम में अक्सर इज्जत का फालूदा बनता ही बनता है। इसका इतिहास गवाह है। फडणवीस ने शुरु से मोठा भाई की बात मानी और बिना तर्क सत्ता सुंदरी का त्याग कर दिया उसी का परिणाम है कि सत्ता सुंदरी को कोई और भोगे इसका रास्ता ही बंद हो गया और छोटे पंवार की दुखती रग पर हाथ रखा और छोटी से जुगाड़ कर देने की जुबान करके फिर से फडणवीस को सत्ता सूंदरी ससम्मान दिला दी।
ये सब सामान्य राजनीति के गणित नहीं है जिनको अंक गणित की तरह आप और हम समझ ले, ये सब काम उस बीज गणित की तरह है जिसका साईन, कॉस, थीटा और एक्स के मान को पढ़-पढ़ कर दिन रात हमने सिर खपाया पर परिक्षा के समय कुछ भी याद नहीं आया। सारे रटे हुए सवाल बेकार गये और नये सवाल आ गये। राजनीति के धंधे में दिन-रात जोड़, घटाव, गुणा, भाग लगा लो पर परिक्षा के समय केवल बीज गणित के सूत्र ही काम में आते है।जिनमे कई रहस्य छुपे होते है।
अंक गणित की तरह आप और हम केवल कांदा, टमाटर, पेट्रोल, डिजल और जातिवाद आदी सामने दिखने वाले मुद्दो को ही राजनीति समझते है लेकिन असल में राजनीति बीज गणित के एक्स के मान की तरह होती है। जैसे कि मोठा भाई ने पूर्ण संख्या फडणवीस में एक्स के रुप में छोटे पंवार का जोड़ किया तो संख्या वह बन गई जिसकी कल्पना वे सब संख्याएँ नहीं कर सकी जो महाराष्ट्र की सत्ता सूंदरी का वरण करने की चाह में पगड़ी पर मोड़ कलंगी बांधे बैठी थी। सबकी पगड़ी रह गई और दुल्हन फिर वही ले उड़ा। अब तो सांप निकलने के बाद लाठी पीटना ही बचा है केवल बाकी दुल्हों के हाथ में ।

-संदीप सृजन
संपादक-शाश्वत सृजन
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नियम तो एक सजा है



हम भारत के लोग हमेशा से नियम तोड़ने में विश्वास रखते है। नियम में रहे तो क्या जीवन। जीवन तो अलमस्त हो तभी मजा है। नियम तो वैसे भी गले में रस्सी जैसा होता है। साला एक सीमा में रहो इससे ज्यादा कुछ मत करो पर हम तो कुछ अलग करने में विश्वास रखते है और नियम-कानून इन सब को तोड़ कर ही सब कुछ करते है।
सरकार ने जब से सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया है। बाजार में, पार्टीयों में तांबे के लोटे और स्टील के गिलास फिर से अपना अस्तित्व जमाने के लिए प्रयास रत है । लेकिन कई सुधिजन है जो लोटे और स्टील के गिलास को हेय दृष्टि से देखते हुए बाजार से दबे छुपे जुगाड़ लगाकर डिस्पोजल गिलास, कटोरी और चम्मच से ही पार्टीयों में मजे उड़ा रहे है । कोई सरकारी नियम का हवाला दे तो कहते है नियम में मजा लिया तो क्या मजा है । नियम तो एक सजा है।
स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है। हमसे ही टेक्स की अतिरिक्त राशि ले कर नगर पालिक निगम हमारे शहर को साफ सुथरा बनाने में लगी है ताकि भविष्य में नम्बर वन का अवार्ड मिल जाए और नेता व अधिकारी तरह-तरह से अनुरोध कर रहे है कि शहर साफ रखे गंदगी न फैलाए वरना जुर्माना लगेगा लेकिन मजाल है कि हम नियम का पालन करे । अभी नवरात्र में खीर और खीचड़ी का प्रसाद मंदिर के बाहर सड़क पर लोगो को पकड़-पकड़ कर बांटा । लोगों ने भी खाया और दोना सड़क पर फैका और चल दिए । नियम तोड़ा सार्वजनिक रूप से पर किसी अधिकारी के बाप की ताकत नहीं की प्रसाद बांटने या खाने वाले पर जुर्माना लगा सके ।सड़क पर बारात और जुलूसों में तो ये नियम डंके की चोट पर हम तोड़ते है । 
चौराहे पर सिग्नल तोड़ कर निकलना तो जैसे गर्व की बात हो इस तरह से लोग लाल बत्ती में तेज गति से निकलते है जैसे नियम इनके बाप की जागीर हो । और जो नहीं निकल पाते या वर्दी वाले के डर के मारे हिम्मत नहीं कर पाते उनका काम नियम की दुहाई देना और मन मसोसकर हरी बत्ती का इंतजार होता है।

मंदिर हो या सिनेमा घर लाईन तोड़कर नियम विरुद्ध जुगाड़ लगा कर आगे लाईन में लगकर होशियार बनने का अवसर कोई भारतवासी नहीं चूकता। ये बात अलग है कि लाख कोशिश के बावजूद कोई पहचान वाला नहीं दिखे और कोई दूसरा जुगाड़ लगा कर निकल जाए तो ईमानदारी की दुहाई देने लगते है।
रेल की टिकट खिड़की पर ‘भय्या रेल निकल जाएगी प्लिज़ हमें टिकट ले लेने दिजिए’ की स्थिती से लगभग हर कोई वाकिफ है । बाकी लाईन में खड़े 50-60 लोग बेवकूफ की तरह उस भय्या वाले या वाली को देखते रहते है और वो घर से देरी से आकर सबको धत्ता दे कर नियम विरुद्ध टिकट ले कर खुशी-खुशी  प्लेटफार्म की ओर बढ़ जाते है । बाकी सब मन ही मन कुढ़ते रहते है।
देश की सरकार से लेकर किसी भी छोटे बड़े आयोजन के मंच का माईक जिनके पास होता है। वो सारे नियम तोड़ने का अधिकार रखता है। दो मिनट का समय दो घंटे में भी पूरा नहीं होता। लगता है ब्रह्मा के दो मिनट को मृत्यूलोक में लागु करने का प्रयास कर रहे है। जब तक संचालक हाथ में पर्ची न थमा दे तब तक भरे सदन नियम तोड़ने का मजा लेते रहते है।आखिर नियम से जिए तो क्या जिए मजा तो नियम तोड़ने में है।(चित्र-गुगल से साभार)
-संदीप सृजन
संपादक - शाश्वत सृजन
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