महावीर के सिद्धांत श्रेष्ठतम उपाय है कोरोना को हराने में




आज सारा विश्व कोरोना की चपेट में है, सभी देश अपने-अपने स्तर पर प्रयासों से इसे हराने में लगे हुए है। इस विश्वव्यापी समस्या से निपटने में विश्व के सभी देशों के बीच में भारत एक महाशक्ति बनकर उभरने की तैयारी में है। भारत विश्व की एक तिहाई जनसंख्या वाला देश होने के बावजूद भी कोरोना पर विजय प्राप्त करने की तैयारी में है। जहॉ विश्व कोरोना के सामने घुटने टेक रहा है वहॉ यह कैसे संभव हुआ। आज सारा विश्व अचंभित है। और भारत की तरफ ही नजरें लगाए देख रहा है। यदि हम देखे तो इसका मूल कारण भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा में होने वाले दिव्य महापुरुषों के द्वारा सुझाए गये वे सिद्दांत है। जो हर समय जीव और जगत के कल्याण के लिए बनाए गये थे।
आज से 2619 वर्ष पूर्व भारत में एक ऐसे महामानव का जन्म हुआ। जो स्वयं के कल्याण से ज्यादा जगत के कल्याण का भाव मन में ले कर जन्मे। जो जन्मे तो राज महल में पर अपने कर्मों से लड़ने के लिए तीर्थंकर ऋषभदेव की परम्परा में वैराग्य के पथिक बने और बगैर दैविक और भौतिक सहयोग के कर्म जंजालों को तोड़ते हुए समाज में नई दिशा का सूत्रपात कर गये। वह राजकुमार थे वर्धमान जो दुनिया में जैन धर्म के चौबिसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के नाम से जाने जाते है। महावीर की उपाधि वर्धमान कुमार को यूँ ही नहीं दी गई है। वे कर्म करने में विश्वास रखते थे, स्वंय ने अपने तप के बल कर्मों पर विजय प्राप्त की थी और दूनिया को भी कर्म करने का संदेश दे गये । इसीलिए उनको श्रमण भी कहा गया है।


महावीर ने मार्ग दिखाया वे किसी के हमराही नहीं बने और न ही उन्होंने किसी को अपना हमराही बनाया, महावीर ने कहा- “धार्यते इति धर्मः” अर्थात जो धारण किया जाए वह धर्म है। शरीर जिसे धारण करे वह वस्त्र है, उसी तरह आत्मा जिसे धारण करे वह धर्म है। और धर्म को जो धारण करता है वह कभी किसी का अहित नहीं करता है, वह अहिंसक होता है। याने जैसा मैं हूँ वैसे ही अन्य जीव है। जैसा मेरा शरीर है, वैसा ही दुसरों का शरीर है। जैसी मेरी आत्मा है, वैसी ही दुसरों की आत्मा है। जैसे कोई मुझे मारता है तो दर्द होता है, वैसे ही मैं दुसरे को मारुंगा तो उसे भी दर्द होगा। जैसे कोई मुझे गलत कहता है, तो मुझे बुरा लगता है, वैसे ही मै दूसरे को कहूंगा तो उसे भी बुरा लगेगा। अहिंसा इन्हीं वेदना और संवेदना का एकाकार रूप है। दुसरों के दुख की अनुभूति जिसे है। वही सच्चा धर्मी है।
कोरोना की रोकथाम के लिए जितने उपाय विश्व स्वास्थ संगठन और हमारे प्रधानमंत्री की पहल पर किए जा रहे है, वे सब महावीर के अहिंसा सिद्धांत का ही विस्तार है। महावीर ने 2600 वर्ष पहले कहा था सामान्य स्थिती में भी मनुष्य को स्वच्छता का पालन करना चाहिए। जिनमे शरीर, वस्त्र, आहार, भूमि और मन की शुद्धता प्रमुख है। महावीर के सिद्धांतों पर केंद्रित 21 दिवसीय लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंस की पहल सराहनीय है। इसके कारण जहां शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आम व्यक्ति प्रयासरत है। वही आहार और वस्त्र शुद्धि भी स्वतः ही हो रही है। आसपास का परिवेश और पर्यावरण भी इन दिनों में सुधरने के कगार पर है। और जब सारी स्थितियां मनुष्य के लिए सकारात्मक होने लगेगी तो मन का शुद्ध होना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है यह उल्लेख हमारे यहां के प्राचीन शास्त्रों में भी मिलता है। आज व्यक्ति चाहे आर्थिक और पारिवारिक और सार्वजनिक गतिविधियों से दूर है। लेकिन उसे अपने आप को समझने का, अपने आप को सुधारने का, अपने आपको जानने का एक अवसर मिला है। महावीर भी यही कहते थे कि अपने आप को जानो। जो अपने आप को जान लेगा वह संसार को जान लेगा। आप यदि स्वयं सुधरे है, स्वयं साफ-सुथरे हैं। तो दूसरों को भी साफ सुथरा रहने के लिए प्रेरित करेंगे। आप स्वयं अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं। तो दूसरों को भी स्वास्थ्य के लिए सचेत करेंगे।




महावीर का हर सिद्धांत 'जियो और जीनो दो' पर आधारित है। आज हम परिग्रह के चक्रव्यूह में उलझे है। लेकिन इस 21 दिन के लॉकडाउन से अपरिग्रह को समझने और अपनाने का अवसर मिला है। जो मेरा है वो सबका है। मुझे जितना चाहिए वो मिल गया दुसरों के अधिकारों पर मैं क्यों कब्जा करुं। यह जिसने समझ लिया उसके लिए सारा संसार अपना घर परिवार होगा। और हमारी “वसुधैव कुटुम्बकम्” अवधारणा साकार हो जाएगी। महावीर ने कहा कि उतना रखो जितनी आवश्यकता है, यानी 'पेट भरो- पेटी नहीं।' यदि आज हम महावीर के इन सिद्धांतों  को मान लें और इसका अनुसरण करें तो विश्व भर में सामाजिक खुशहाली होगी। और सारे विश्व में सच्चा समाजवाद स्थापित हो सकेगा।
महावीर ने संसार को अनेकान्तवाद का आदर्श पाठ सिखाया। यानी मैं जो कह रहा हूं। वह भी सत्य है और जो दूसरे कह रहे हैं वह भी सत्य हो सकता है। हम हर तरफ अपनी आंख और कान खुले रखें। देश-विदेश हो, समाज हो, जाति हो या परिवार आपसी संघर्ष का मुख्य कारण है वैचारिक वैमनस्यता। लेकिन अनेकान्तवाद ही एकमात्र औषधि है जो इस वैचारिक वैमनस्यता की बीमारी को जड़ से समाप्त कर सकती है।



कोरोना के संक्रमण को मिटाना है तो हमें अपने आप में केन्द्रीत होना पड़ेगा, सामाजिक दुरी रखनी होगी। साथ ही शरीर की शुद्धि तथा आहार की शुद्दि पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा। विश्व में जो महामारी फैलाकर तीसरे विश्व युद्ध का अप्रत्यक्ष आगाज़ किया है। इससे बचे रहने के लिए महावीर के सिद्धांत ही श्रेष्ठतम उपाय है। समस्याएं महावीर के युग में भी थी, वर्तमान में भी है और आने वाले समय में भी होगी पर महावीर के दिखाए अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत का मार्ग यदी हम अपनाए तो विश्व की हर समस्या का हल हमें अपने आसपास ही मिल जाएगा। हमें कहीं और ढूढ़ने की जरुरत नहीं है।
-संदीप सृजन
संपादक-शाश्वत सृजन           
ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन (म.प्र.)
मो. 9406649733
मेल- sandipsrijan.ujjain@gmail.com


जनचेतना जगाती कृति- 'नदिया का संगीत'




*कृति- नदिया का संगीत
*लेखक- टीकम चन्दर ढोडरिया
*प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर
*पृष्ठ- 80
*मूल्य-100/-
भारतीय छंद शास्त्र में दोहा सर्वाधिक प्रचलित छंद है, भक्ति काल से वर्तमान काल तक दोहा छंद हर कवि को किसी न किसी रूप रास आया है। 13-11 मात्राओं के दो पदों में कवियों ने नवरसों को समाहित किया हैं। किसी भी विषय पर दोहा छंद में आसानी से और त्वरित कोई भी बात कही जा सकती है।हाल ही में कविवर टीकम चंदर ढोडरियाजी का दोहा संग्रह “नदिया का संगीत” बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुआ है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि यह संग्रह नदी पर केंद्रित है। साथ ही 31 अन्य विषयों पर भी इस कृति में दोहे समाहित है। लेकिन सबसे ज्यादा 116 दोहे केवल नदी पर केंद्रित है। ढोडरिया जी वर्तमान में राजस्थान में निवासरत है, लेकिन कहीं न कहीं उज्जैन शहर जो कि मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी है उससे उनका बेहद जुड़ाव रहा है यह बात इस संग्रह के प्रारंभ में ही देखने को मिलती है। इस संग्रह की शुरुआत ही वे उज्जयिनी की स्तुति शीर्षक से लिखे सात दोहों से करते हैं, और फिर अपनी कृति के शीर्षक विषय नदी पर आते हैं। इस कृति में नदी को विभिन्न स्वरूपों से अलंकृत किया गया है जिसकी बानगी अलग-अलग दोहों में पढ़ने को मिलती है। वे लिखते हैं-

सुचिता की मूरत नदी, गरिमा की पहचान।
पहने हैं निज- देह पर, लहरों का परिधान।।
नदिया पर बूंदे गिरीं, कल जब मेरे गाँव।
मैं समझा तुम आ गयीं, पायल बांधे पाँव।।
वही आज की नदियों की बदतर स्थिति पर भी लिखने से नहीं चूकते हैं और नदियों के दर्द को इन शब्दों में कहते हैं-
अमरित-सम था जल कभी, आती आज सड़ांध।
क्या से अब क्या कर दिया, है मानव स्वार्थांध।।
कितना मैला हो गया, आज नदी का नीर।
खदबद अब करने लगी, देखो उसकी पीर।।

दोहा छंद की विशेषता है कि इस छंद में बात सहज और सरल शब्दों में कही जा सकती है। जैसा नदी और नारी पर समानता बताते हुए दोहे में ढोडरियाजी ने कही है।
नदिया नारी का रहा, सदा एक व्यवहार।
औरों के सुख हेतु वह, सहती कष्ट अपार।।
नदी की बात जब कभी की जाती है तो जंगल की बात होना स्वाभाविक है, अगले विषय के रूप में ढोडरियाजी वनों की पीड़ा को अपने शब्द देते हैं-
ज्यों-ज्यों सभ्य हुआ सखे, बढ़ी मनुज की भूख।
गुमसुम से रहने लगे, अब जंगल के रूख।।
शहरी सभ्यता के चलते वनों का जो हाल हमने किया है उस पर भी ढोडरियाजी लिखते हैं-
सिसक रही हैं डालियाँ, लगे काँपने पात।
जंगल में जब से घुसी, शहरी आदम जात।।

वर्तमान में सबसे ज्यादा कविता जिस विषय पर लिखी जा रही है, वह विषय है बेटी, बेटी के प्रति वे अपनी अभिव्यक्ति को शब्दों का जामा पहनाते हो कहते हैं-
गणित दुई की एक-सी, पीहर या ससुराल।
बिटिया हल करती रही, दोनों जगह सवाल।।
इस विषय पर 15 दोहे लिखे हैं, जो पाठकों की आँखों में पानी ला देंगे। गांव शीर्षक से कृति में 13 दोहे हैं। जिनमें गांव के शहर बनने की पीड़ा और पुरातन गाँव का स्वरूप है। इन दोहों मे कुछ ऐसे शब्द पढ़ने को मिलते हैं जो आज के शहरी वातावरण में लुप्तप्राय हो चुके हैं। शहरी समाज या कहे कि शहरी सभ्यता का इन शब्दों से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है। ढोडरियाजी पुनः गाँव ले जाना चाहते पाठकों को वे लिखते है-
परहैण्डी, पनघट सजे, जगे अलगनी भाग।
हम से बतिया ने लगे, फिर चूल्हे की आग।।
काँकड़ से पहुंची नजर, ज्यों ही मेरे गाँव।
अगवानी को आ गई, यादे नंगे पाँव।।

नदिया का संगीत में विभिन्न ऋतुओं, त्यौहारों,जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर केन्द्रीत दोहे है। साथ ही रति भाव से ओतप्रोत श्रंगार रस में भींगे दोहे भी बहुत शालिन शब्दों में ढोडरियाजी ने कहे है। दोहों की बात हो और कबीर का सुफियाना दार्शनिक अंदाज न दिखे तो बात अधुरी लगती है। जीवन का आधार, होगा वहीं हिसाब,कैसे खोजूँ राम,यक्ष प्रश्न जैसे शीर्षक के साथ दार्शनिक दोहे इस कृति को एक चिंतनशील कृति निरुपित करते है। कृति के सारे दोहे कुछ न कुछ कहते है। हर विषय रूचिकर है। सामयिक है। हॉ कुछ जगह शब्दों का दोहराव जरूर पाठकों पसंद न भी आए पर रचनाकार की प्रतिभा को दर्शाता है। जिनमें शब्द वहीं है पर बात हर जगह अलग है। बोधि प्रकाशन ने कृति को आकर्षक रूप में पाठकों तक पहुंचाया है। यह कृति विषय के अनुसार जनचेतना जगाती कृति है। पाठकों को अपने भूतकाल में झांकने को विवश करती है। हम कैसे थे, कैसे हो गये ये सोचने पर मजबूर करेगी। एक चिंतनशील कृति समाज में लाने के लिए ढोडरियाजी को साधुवाद... बधाई।

 चर्चाकार 
-संदीप सृजन
संपादक- शाश्वत सृजन
ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन 456006
मो. 09406649733


सामाजिक मूल्यों को पोषित करती कृति 'सपनों के सच होने तक'




एक कविता जितनी देर में पढ़ी या सुनी जाती है उससे हजार गुना अधिक समय में वह कागज पर अवतरीत होती है, और उससे भी हजार गुना समय उस विषय को चिंतन-मनन करने में कवि लगाता है। कविता का जन्म जब होता है, उससे पहले रचनाकार के विचारों में एक लंबा संघर्ष चल रहा होता है। तभी कविता यथार्थ के धरातल पर टिकती है और पाठक या श्रोता के मानस में अपना स्थान बना पाती है।
*कृति- सपनों के सच होने तक
*लेखक- राजकुमार जैन ‘राजन’
*प्रकाशक- अयन प्रकाशन, दिल्ली
*मूल्य-260/-
*समीक्षक-संदीप सृजन
लब्ध प्रतिष्ठित कलमकार और संपादक राजकुमार जैन ‘राजन’ की कविताओं का दूसरा संग्रह 'सपनों के सच होने तक' शीर्षक से हाल ही में अयन प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। राजन जी नियमित सृजनधर्मी है, विचार और चिंतन और सृजन तीनों प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही वे अपना लिखा सार्वजनिक करते है। ये उनकी विशेषता है। इक्यावन कविताओं के इस संग्रह में सामाजिक सरोकार की रचनाएँ ज्यादा है। जो होना भी चाहिए। जब हम समाज को अपनी रचनाएँ सौप रहे है तो सामाजिक सरोकार प्राथमिक होना चाहिए। कपोल कल्पना मनोरंजन कर सकती है पर समाज को कुछ दे नही सकती। राजन जी हमेशा समाज को देने का भाव रखते है इसीलिए वे समाज के हर पहलू पर स्वयं को केन्द्र में रखकर लिखते है।समाज की दोहरी मानसिकता पर उनकी कविता विष बीज जोरदार प्रहार करती है वे रचना के अंतिम पदों में लिखते है- छोटा हो या बड़ा /अपराध अपराध ही होता है/ जो विष बीज बोता है/ जिसके जहर से / समाज मृत होता है / दोहरा जीवन, दोहरी संस्कृति /जीना छोड़ना होगा /तभी उद्घोष होगा /सत्यम, शिवम, सुंदरम का। राजन जी कविता प्रश्न और उत्तर में जो कहते है वो बहुत गंभीर बात है और ऐसा लगता है वे सीख दे रहे है ,वे कहते है- जिंदगी के थपेड़ों में /गुम हो हो चुके प्रश्नों को /खोज लेने से क्या होगा /जबकि बहरे हुए समय में / उत्तरों का छोर कहां है। वर्तमान में जो मूल्य हृास हो रहे है उन्हें बचाने की एक अच्छी कोशिश है। वे नये युग की वसियत रचना में लिखते है- धोखा यहॉ परम्परा/झूठा गढ़ा इतिहास ही/ अब हमारी संपदा है/ क्या मान्यताओं की / झूठी लक्ष्मण रेखा/ अब टूटेगी?/मुक्त होंगे इनकी कैद से हम/उग रहा है नया सूरज/ नया प्रकाश फैलाने को।


वेदना और संवेदना कविता का आत्मतत्व होता है, एक अच्छी रचना इन तत्वों के बिना बन ही नहीं सकती है। बाढ़, नये युग की वसीयत, मानवता का कत्ल, नई पीढ़ी जैसी रचनाएँ समाज की पीड़ा है। जो हर इंसान कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में भोग रहा है। पीड़ा प्रश्न के डंर, मैं कृष्ण बोल रहा हूँ, मानवता का पुनर्जन्म जैसी कविता पुरातन आख्यानों का नवस्वरूप है जो आज भी समाज में जिंदा है। मेरे भीतर बहती है नदी,लालिमा सूर्योदय की, पुनर्जन्म, समर्थन , चलो, फिर से जी ले जैसी रचनाएँ जीवन को नव चेतना देने में सहायक है।

वही समाज में जब बहुत ज्यादा असामाजिकता आती है और मानव अमानवीय होने लगता है तब राजन जी की कविता के बदले तेवर लिखते है ईश्वर मर गया है, ऐसा एक दीप जलाऊं, प्रश्नों की परछाईयॉ जैसे रचनाएँ जो बोध करवाती है समाज में यह गलत हो रहा है। इस कृति में कईं रचनाओं में एक संदेश दोहराया गया है वह है सत्यम, शिवम,सुंदरम । जो की संसार का सार तत्व है और स्वयं का बोध करवाता है।
राजन जी की यह कृति पूरी तरह से संवेदना से भरी हुई है। हर रचना में उनकी संवेदनशीलता दिखाई दे रही है। राजन जी की यह कृति सामाजिक मूल्यों को पोषित करती है। सपनों के सच होने तक के लिए राजन जी को बधाई ...।
-संदीप सृजन
संपादक- शाश्वत सृजन
ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन 456006
मो. 09406649733


व्यंग्य और हास्य का बेहतरीन संतुलनः डेमोक्रेसी स्वाहा




*कृति- डेमोक्रेसी स्वाहा
*लेखक- सौरभ जैन
*प्रकाशक- भावना प्रकाशन, दिल्ली
*पृष्ठ-128
*मूल्य-195/-
बहुत छोटी उम्र में व्यंग्य के क्षेत्र में अपनी पैठ बना चुके सौरभ जैन का हाल ही में पहला व्यंग्य संग्रह ‘डेमोक्रेसी स्वाहा’ भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। 52 व्यंग्य इस संग्रह में प्रकाशित है, जिनमें से अधिकांश विभिन्न दैनिक अखबारों के व्यंग्य का कालमों में प्रकाशित हुए हैं, कुछ अप्रकाशित भी हैं।
जैसा की नाम से ही लगता है कि राजनीति इस संग्रह का केन्द्र बिन्दू है। राजनैतिक विद्रुपताओं पर सौरभ ने बहुत अच्छे से अपनी कलम चलाई है। व्यंग्य कोई नई विधा नहीं है, लेकिन वर्तमान व्यंग्य विधा के दो प्रमुख स्तंभ शरद जोशी और हरिशंकर परसाई माने जाते हैं, और पत्र-पत्रिकाओं तथा अखबारों में जो व्यंग्य कॉलम प्रकाशित हो रहे हैं वह इन्हीं दो व्यंग्य पुरोधाओं की ही देन है। सौरभ के व्यंग्य उनको शरद जोशी की परम्परा में लाकर खड़ा करते है। क्योंकि उनके व्यंग्य लघु और संतुलित है साथ ही सामयिक भी है। लेखन में व्यंग्य के साथ हास्य का पुट भी है और दोनों का संतुलन भी बेहतरीन है।
सौरभ जब लिखते हैं कि “सड़क पर जब किसी गड्ढे का जन्म होता है तो सड़क की बहन और गड्ढे की मौसी बरखा रानी झूम कर उसे पानी से लबालब भर देती है। यह जलकुंड सूक्ष्मजीवों के लिए समुद्र की तरह होता है, गड्ढे मच्छरों की जन्मस्थली होते हैं, एक प्रकार से गड्ढे चिकित्सकों को रोजगार प्रदान करने का साधन भी है।” तो व्यंग्य गुदगुदी करता है, साथ ही उस व्यवस्था पर भी प्रहार करता है जो आम आदमी की पीड़ा है।


और जब वो लिखते हैं कि “कुपोषण को दूर करने के तमाम प्रयास विफल होने पर सरकार के लिए अब आवश्यक है कि पोषण आहार में साबुन का वितरण किया जाना चाहिए क्योंकि मलाई, केसर, हल्दी, चंदन जैसे तत्व नहाने के स्थान पर खाने में अधिक उपयुक्त रहेंगे।” तो भ्रमित करने वाले व्यवस्था और विज्ञापनों को चेलेंज करते है। कि सरकार की आंखों के सामने देश की जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है। और सरकारी अमला मौन देख रहा है।
अखबार अब लोकतंत्र के जवाबदार स्तंभ नहीं रहे, ऐसे में सौरभ लिखते हैं कि “अखबारों को उठाकर देखा जाए तो पेपर में ऊपर न्यूज़ होती है कि गर्मी से हाल बेहाल और ठीक नीचे ए सी पर भारी डिस्काउंट का विज्ञापन दिया रहता है। अब यह तो तंबाखू को बेचकर कैंसर के इलाज का मार्गदर्शन देने वाला युग है।”


सौरभ लोकतंत्र की सबसे लच्चर हो चुकी व्यवस्था जिसे डेमोक्रेसी कहा जाता है। उस पर खुल कर लिखते हैं कि “देश के विकास में जेलों का जो योगदान है, उसके मापने का यंत्र अब तक विकसित नहीं हो सका है। आजादी के काल से ही जेल में जाने का चलन प्रचलन में है। तब अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध तथा जनता के हित के लिए नेता जेलों में जाया करते थे। लेकिन आज के नेता स्वयं का इतना हित कर लेते हैं कि उन्हें जेल जाने की नौबत आन पड़ती है। जेल में रहकर भी वे विकास पुरुष कहलाते हैं कुछ एक तो अंदर रहकर ही चुनाव जीत जाते हैं।”
मोबाइल की लत पर वे चुटकी लेने से नहीं चुकते और लिखते है “सेल्फी नामक संक्रामक रोग इसी तरह फैलता रहा तो कल को लोग भगवान के आगे ऐसी मन्नतें लेकर खड़े मिलेंगे, हे! प्रभु मेरी मुराद पूरी हो तो हो गई तो मैं 3 दिन तक कोई सेल्फी नहीं लूंगा। मतलब अन्न-जल त्याग वाली तपस्या डिजिटलीकरण के दौर में इस रूप में रूपांतरित होना तय है।"
असली डेमोक्रेसी होती है अफसर का तबादला करवाना लेकिन कोई अफरस खुद तबादला करवाना चाहे तो उपाय बताते हुए सौरभ लिखते है “यदि किसी अधिकारी को अपना तबादला करवाना है तो उसे अपना काम ईमानदारी से करना प्रारंभ कर देना चाहिए आप ईमानदारी दिखाइए वे तबादला थामा देंगे।”
‘डेमोक्रेसी स्वाहा’ के 52 व्यंग्यों में कोई भी व्यंग्य कथ्य और तथ्य के मामले में कमजोर नहीं लगता, हर व्यंग्य कुछ न कुछ कहता है। संग्रह के सभी व्यंग्य मध्यम आकार के है जो पाठकों को बोरियत महसूस नहीं होने देते है। और अपनी बात भी पूरी तरह से कह रहे हैं। 25 बसंत के पहले किसी मंझे हुए लेखक जैसा व्यंग्य संग्रह एक बड़े प्रकाशन से आना इस बात की पुष्टि करता है कि सौरभ में व्यंग्य के क्षेत्र में अपार संभावना दिखाई देती है। इस कृति के लिए सौरभ जैन बधाई के पात्र है। अशेष शुभकामनाएं...।
-संदीप सृजन
संपादक- शाश्वत सृजन
ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन 456006
मो. 09406649733


युवाओं का मार्गदर्शन करती कृति- जीना इसी का नाम है



*कृति- जीना इसी का नाम है
*लेखक- राजकुमार जैन राजन
*प्रकाशक- अयन प्रकाशन दिल्ली
*पृष्ठ-104 (सजील्द)
*मूल्य-200/-
वर्तमान में बाल साहित्य उन्नयन के लिए एक नाम देशभर में जाना पहचाना है, वह है श्री राजकुमार जैन राजन का, जो कि तन-मन और धन तीनों तरह से बाल साहित्य के लेखन, प्रकाशन और निःशुल्क वितरण के क्षेत्र में अपना अहम योगदान दे रहे हैं। बाल साहित्य के अलावा भी उनका अध्ययन और लेखन अन्य विषयों पर भी बहुत गहन रहा है, तीन दशक से भी अधिक समय से राजन जी संपादन के कार्य से जुड़े हुए हैं, कई सामाजिक, साहित्यिक पत्रिकाओं का अपने स्तर पर संपादन कर चुके हैं साथ ही कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं के विशेषांकों का संपादन भी आपने किया है। राजन जी के बाल साहित्य से इतर हुए रचनात्मक और प्रभावी लेखन का एक संकलन हाल ही में अयन प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है जीना इसी का नाम है ।
यह संकलन उनके द्वारा लिखे हुए संपादकीय लेखों का संकलन है।यह संकलन उनके अनुभव का पुलिंदा है जिसमें केवल नवनीत है। छाछ जैसा कुछ भी नहीं। इस कृति में उनके लिखे 29 लेख शामिल है, जो कि प्रकाशन के समय तो पाठकों की पसंद रहे ही है। लेकिन आज भी उनकी प्रासंगिकता कम नहीं होती है, पुस्तक का पहला लेख अपने आप में महत्वपूर्ण है पहले स्वयं का निर्माण करें शीर्षक से लिखे इस लेख में वे लिखते हैं- वर्तमान युग नैतिक दुर्भिक्ष का युग है जीवन में नैतिक और चारित्रिक मूल्य बिखरते जा रहे हैं, नष्ट होते जा रहे हैं, स्वार्थपरायणता और लोभवृत्ति ने मानव को इतना निकृष्ट बना दिया है कि नीति, सत्य, प्रामाणिकता, ईमानदारी, सदाचरण जैसे गुण छुटते जा रहे हैं।
वही दो अनुच्छेदों के बाद इसी लेख में वे लिखते हैं कि- आज राष्ट्र में चारों ओर आध्यात्मिक जागृति और नैतिक उत्थान के साथ समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण की चर्चा है निर्माण भले ही किसी भी स्तर पर क्यों न हो वह स्वागत योग्य है। जो कि अनैतिकता के बीच नैतिक संस्कारों की पैरवी है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का एक सफल प्रयास है। प्रकृति के माध्यम से भी इस लेख में उन्होंने बहुत कुछ कहा है।
जीवन कितना है यह हम सब जानते हैं, पर कैसा हो यह नहीं शायद इसीलिए राजनजी लिखते हैं जीवन की समग्रता के बारे में सोचें इस लेख में बहुत कुछ वह लिखा गया है जो आज जेएनयू में घटित हो रहा है- इतनी शिक्षा के बावजूद आज समाज में हिंसा और अशांति बढ़ती जा रही है। उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ रहा है इसका कारण क्यों नहीं खोजा जाता? उनकी चिंता सही भी है। आगे वे लिखते है- अतीत में भी अच्छाइयां और बुराइयां थी, लेकिन वह अच्छाइयों पर हावी नहीं थी। बुरे लोग कृष्ण के समय में भी थे और महावीर के समय में भी थे लेकिन इसका अनुपात में असंतुलन में नहीं था, जैसे-जैसे उपभोक्तावाद बढ़ा तो बुराई के रूप में हिंसा और अपराध भी बढ़े। भ्रष्टाचार जैसी बुराई भी इसी उपभोक्तावाद की देन है । जिस समय यह लेख लिखा गया था उस समय से आज की स्थिती और बद्तर है।


इस पुस्तक के अच्छे लेखों में नारी ने विकास के नए आयाम छुआ है को मानता हूँ। जिस तरह पौराणिक नारी और वर्तमान की नारी पर अच्छी कलम राजनजी ने चलाई है वे लिखते है- नारी के विकास के लिए चार तत्व होते हैं शिक्षा, दृढ़ इच्छाशक्ति अर्थात संभल होना,शक्ति अर्थात सबल होना,स्वावलंबी और स्वतंत्रता अर्थात छोटे-छोटे निर्णय लेने की क्षमता। इन चारों तत्वों से परिपूर्ण नारी परिवार का ही नहीं स्वच्छ समाज का भी निर्माण कर सकेगी।
पारिवारिक विघटन के दौर में लेख रिश्तो को डिस्पोजल होने से बचाएं भी प्रासंगिक बन पड़ा है। अन्य लेख जैसे व्यर्थ को दे अर्थ, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती, समस्या की मिट्टी में समाधान का अंकुर फूटता है, व्यक्ति अपने जीवन का स्वयं वास्तु शिल्पी है मोटिवेशन करते है। अधिकांश लेख इसी शैली के है। जो कि समय की मांग के साथ अनिवार्य भी है। अन्य लेखों में पुस्तक पढ़ने और संरक्षण के उपर दो लेख तथा राष्ट्रीयता पर केन्द्रीत तीन लेख, मातृभाषा पर एक लेख के साथ ही अन्य विषयों पर है जो आदर्श समाज के लिए और हमारी नई पौध के लिए बेहद जरुरी है।
पुस्तक का प्रकाशन आकर्षक है वहीं सजा-सज्जा भी सुंदर है लेकिन एक बात की कमी इस कृति में खलती है। जो लेख राजन जी ने लगभग 2 से 3 दशक पूर्व लिखे है वह तब से लेकर आजतक भी प्रासंगिक हैं, इसलिए उन लेखों के अंत में पत्रिका का नाम और प्रकाशन वर्ष भी दिया जाता तो ज्यादा अच्छा रहता ताकि पता चल सके कि जो समस्याएं या जो स्थितियां दो-तीन दशक पूर्व समाज में थी आज भी है और भविष्य उनके निराकरण की राह देख रहा है। साथ ही प्रुफ पर भी थोड़ा ध्यान दिया जाना जरुरी था।
चूंकि राजनजी बाल साहित्य के सृजन और प्रकाशन के विशेष पक्षधर है ऐसे में उनकी यह कृति बच्चे से युवा होते देश के भविष्य के मार्गदर्शन का काम करेंगी। एक अच्छी पुस्तक समाज को देने के लिए राजनजी बधाई के पात्र है।
*समीक्षक
 संदीप सृजन
 संपादक- शाश्वत सृजन
 ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन 456006
 मो. 09406649733